| नसतेस घरी तू जेव्हा |
| जीव तुटका तुटका होतो |
| जगण्याचे विरती धागे |
| संसार फाटका होतो |
| नभ फाटून वीज पडावी |
| कल्लोळ तसा ओढवतो |
| ही धरा दिशाहीन होते |
| अन् चंद्र पोरका होतो |
| येतात उन्हे दाराशी |
| हिरमुसून जाती मागे |
| खिडकीशी थबकुन वारा |
| तव गंधावाचून जातो |
| तव मिठीत विरघळणाऱ्या |
| मज स्मरती लाघववेळा |
| श्वासाविण ह्रुदय अडावे |
| मी तसाच अकंतिक होतो |
| तू सांग सखे मज काय |
| मी सांगू या घरदारा ? |
| समईचा जीव उदास |
| माझ्यासह मिणमिण मिटतो |
| ना अजून झालो मोठा |
| ना स्वतंत्र अजुनी झालो |
| तुजवाचून उमगत जाते |
| तुजवाचून जन्मच अडतो ! |
| गीत - संदीप खरे |
एक प्रयत्न आहे, की अपनास कविता, यस एम् यस, लेख, आणखी इतर बाबी एकाच ठिकाणी देने, यावर आपली प्रतिक्रिया, सूचना असतील तर कृपया द्यावे, त्याचे स्वागत असेल ...
हव ते शोधा
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Wednesday, May 26, 2010
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