| अजुन तरी रुळ सोडुन सुटला नाही डब्बा |
| अजुन तरी रुळ सोडुन सुटला नाही डब्बा |
| अजुन तरी नाही आमच्या चारित्र्यावर धब्बा ॥धृ॥ |
| आमच्या देखिल मनी आले चांदण्याचे पुर |
| आम्हालाही दिसल्या शम्मा अन शम्मेचे नूर |
| अजुन तरी परवाना हा शम्मेपासुन दुर |
| मैत्रिणीच्या लग्ना गेलो घालुन काळा झब्बा |
| अजुन तरी नाही आमच्या चारित्र्यावर धब्बा ॥१॥ |
| कुणी नजरेचा ताणुन बाण केलेली जखमी |
| कुणी ओठांची नाजुन अस्त्रे वापरली हुकमी |
| अन शब्दांचे जाम भरुन पाजियेले कोणी |
| मयखान्यातही स्मरले आम्हा मंदिर मस्जिद काबा |
| अजुन तरी नाही आमच्या चारित्र्यावर धब्बा ॥२॥ |
| कधी गोडीने गाउ गेलो जोडीने गाणी |
| रमलो हे जरी विसरुन सारे आम्ही खुळ्यावानी |
| सर्वस्वाचे घेउनी दाने आले जरी कुणी |
| अजुन तरी सुटला नाही हातावरचा ताबा |
| अजुन तरी नाही आमच्या चारित्र्यावर धब्बा ॥३॥ |
| कोण जाणे कोण मजला रोखुन हे धरते |
| वाटा देती हाका तरिही पाउल अडखळते |
| कुठल्या शपथेसाठी माझी ओंजळ थरथरते |
| मोहाहुन ही मोहक माझी हुरहुरण्याची शोभा |
| अजुन तरी नाही आमच्या चारित्र्यावर धब्बा ॥४॥ |
| अजुन तरी रुळ सोडुन सुटला नाही डब्बा |
| अजुन तरी नाही आमच्या चारित्र्यावर धब्बा ... |
एक प्रयत्न आहे, की अपनास कविता, यस एम् यस, लेख, आणखी इतर बाबी एकाच ठिकाणी देने, यावर आपली प्रतिक्रिया, सूचना असतील तर कृपया द्यावे, त्याचे स्वागत असेल ...
हव ते शोधा
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Wednesday, May 26, 2010
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